विनोबा के कार्य और जीवन-संदेश को आगे बढ़ाने के लिए हममें जैसी करुणा चाहिए, वह भाईजी में ही साकार दिखती थी।
उनका गाया ‘जय जगत’ गीत तो न्याय, शांति और प्रेम का मानो जागतिक हृदयगान ही बन गया है।
जय जगत, जय जगत, जय जगत पुकारे जा...
जय जगत पुकारे जा, सर अमन पे वारे जा
सबके हित के वास्ते अपना सुख बिसारे जा।
प्रेम की पुकार हो,सबको सबसे प्यार हो
जीत हो जहान की, क्यों किसी की हार हो। जय जगत...
न्याय का विधान हो, सबका हक समान हो
सबकी अपनी हो जमीन, सबका आसमान हो। जय जगत ...
रंग भेद छोड़ दो, जाति पाँति तोड़ दो..
मानवों में आपसी अखंड प्रीत जोड़ दो। जय जगत...
शांति की हवा चले, जग कहे भले भले
दिन उगे सनेह का, रात रंज की ढले।।
जय जगत, जय जगत, जय जगत पुकारे जा...
विनोबा कहते थे कि सत्यसाधक का शरीर जैसे-जैसे वृद्ध होता जाता है, वैसे-वैसे सत्य, प्रेम और करुणा से भरा उसका आत्मबल बढ़ता ही जाता है। भाईजी जीवनपर्यंत उसी ऊर्जा से भरे रहे।
वह ऊर्जा अब सत्य में समा गई है। वह हम सबको ऊर्जस्वित करती रहेगी।
~मनीषा, माशा, अव्यक्त
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