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Happy Children

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Children at Dhapo Colony Slum

Sunday, June 21, 2020

1400 बुद्धिजीवियों, शिक्षाविदों एवं नागरिक सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने भारत में “स्टार्स” (स्ट्रेंथेनिंग टीचिंग लर्निंग एंड रिजल्ट्स फॉर स्टेट्स - STARS) शिक्षा परियोजना के स्थगन के लिए विश्व बैंक को लिखा खत


एक सामूहिक पत्र के माध्यम से देश भर के 24 राज्यों से शिक्षाविदों, शिक्षा के मसले पर कार्यरत संगठनों व मंचों, शिक्षक संघों और नागरिक संगठनों के प्रतिनिधियों, जमीनी स्तर पर सक्रिय संगठनों, शोधकर्ताओं और नागरिकों समेत 1400 लोगों ने हस्ताक्षर करके “स्टार्स शिक्षा परियोजना को तत्काल प्रभाव से स्थगित करने और व्यापक सार्वजनिक परामर्श-विमर्श के जरिये वस्तुस्थितियों के ठोस आकलन के के बाद ही इस परियोजना को अंतिम रूप देने की मांग की।“
नई दिल्ली, 21 जून, 2020: देश भर के 24 राज्यों से ख्यातिलब्ध 1400 शिक्षाविदों, बुद्धिजीवियों, शोधकर्ताओं, शिक्षकों संघों और नागरिक संगठनों के प्रतिनिधियों, जमीनी स्तर पर सक्रिय संगठनों और सामाजिक क्षेत्र में कार्यरत विभिन्न नेटवर्कों/मंचों ने विश्व बैंक से भारत में 6 राज्यों में पठन- पाठन के सशक्तीकरण के लिए प्रस्तावित विश्व बैंक वित्तपोषित स्टार्स (STARS) परियोजना के तहत मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एमएचआरडी) को दिये जाने कर्ज को तत्काल प्रभाव से स्थगित करने का आग्रह किया है।  

हार्टविग स्कैफ़र, उपाध्यक्ष, दक्षिण एशिया क्षेत्र, विश्व बैंक को लिखे इस सामूहिक पत्र पर शांता सिन्हा, पूर्व अध्यक्ष, एनसीपीसीआर; मनोज झा, सांसद, राज्यसभा-राष्ट्रीय जनता दल (बिहार); जयति घोष, प्रोफेसर, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय; रितु दीवान पूर्व निदेशक, अर्थशास्त्र विभाग, मुंबई विश्वविद्यालय; आर गोविंदा- पूर्व वीसी, न्यूपा;  प्रो॰ अनीता रामपाल, दिल्ली विश्वविद्यालय; देविका सिंह, राइट टू अर्ली चाइल्डहुड डेवलपमेंट; प्रवीण झा, प्रोफेसर, जेएनयू; नित्या नंदा, निदेशक, काउंसिल फॉर सोशल डेवलपमेंट, नई दिल्ली; वादा ना तोड़ों अभियान;  राइट टू एजुकेशन (आरटीई) फोरम; नेशनल कोएलिशन ऑफ एजुकेशन (NCE) इंडिया; अखिल भारतीय प्राथमिक शिक्षक महासंघ (AIPTF); अखिल भारतीय माध्यमिक शिक्षक महासंघ (AISTF);  ऑल इंडिया फेडरेशन ऑफ टीचर्स ऑर्गनाइजेशन (AIFTO); ओक्स्फैम इंडिया;  समेत 1400 लोगों के हस्ताक्षर हैं।
पत्र में स्टार्स परियोजना के बारे में कुछ अहम चिंताओं को उठाया गया है जिनमें समाज के हाशिये पर मौजूद वंचित समुदायों और कमजोर वर्गों के बीच शिक्षा की पहुंच सुनिश्चित करने के लिए सुधार के ठोस प्रावधानों और किसी मुकम्मल रणनीति का अभाव, शिक्षा के क्षेत्र में मुनाफे की दृष्टि से संचालित निजी संस्थाओं की अत्यधिक व संभावित भागीदारी के साथ-साथ निजी-सार्वजनिक साझेदारी पर ज्यादा ज़ोर और सीखने-सिखाने संबंधी कक्षायी प्रक्रियाओं एवं वर्तमान शैक्षिक परिदृश्य के सामने मौजूद मूल चुनौतियों को दरकिनार कर मानकीकृत मूल्यांकनों को ज्यादा तरजीह देना जैसे अहम सवाल शामिल हैं।  साथ ही, हस्ताक्षरकर्ताओं ने प्रस्तावित स्टार्स परियोजना पर हुई चर्चा को नाकाफी बताते  हुए विश्व बैंक और मानव संसाधन मंत्रालय से मांग की कि परियोजना को अंतिम स्वरूप देने के पहले इस मसले पर ज्यादा-से-ज्यादा सार्वजनिक परामर्श गोष्ठियाँ बुलाई जाएँ और लोगों की राय मांगी जाए।
नागरिक सामाजिक संगठनों की तरफ से यह सामूहिक पत्र ऐसे समय में आया है जब पहले से ही खस्ताहाल भारत की शिक्षा व्यवस्था, कोविड-19 के रूप में आई वैश्विक महामारी की पृष्ठभूमि में अभूतपूर्व संकट से जूझ रही है। आशंका जताई जा रही है कि हाशिये पर मौजूद दलित-वंचित-आदिवासी समुदायों समेत सामाजिक असुरक्षा, कमजोर आर्थिक स्थिति और रोजी-रोजगार की समस्या से जूझ रहे असंगठित क्षेत्र में कार्यरत व्यापक आबादी पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है और इन समुदायों से आनेवाले बच्चे स्कूल से भारी संख्या में ड्रॉप-आउट हो सकते हैं। मलाला फंड की रिपोर्ट के अनुसार, कोविड-19 महामारी के परिणामस्वरूप दुनिया भर में 1 करोड़ लड़कियों के स्कूल से बाहर होने का अनुमान है।
निजी संस्थाओं की बड़े पैमाने पर संभावित भागीदारी चिंताजनक है
विश्व बैंक द्वारा दिये जा रहे इस कर्ज के संदर्भ में उपलब्ध दस्तावेजों के विश्लेषण से पता चलता है कि स्टार्स (STARS) परियोजना के लिए प्रस्तावित कुल पैसे में विश्व बैंक द्वारा महज 500 मिलियन डॉलर ही दिया जाएगा और शेष 85 फीसदी राशि का भुगतान भारत सरकार और संबंधित राज्य सरकारों द्वारा किया जाएगा। ऐसे में परियोजना में निजी संस्थाओं द्वारा सार्वजनिक धन के संभावित दुरुपयोग की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए इस पत्र के जरिये ऐसी किसी भी संभावना के मद्देनजर इस कर्ज पर रोक लगाने व उपयुक्त प्रशासनिक तंत्र की स्थापना की मांग की गई है। साथ ही, सरकारी स्कूल प्रणाली को मजबूत करने और शिक्षा का अधिकार (आरटीई) कानून के तहत उल्लिखित प्रावधानों को सख्ती से लागू करने की मांग की गई है।
राइट टू एजुकेशन (आरटीई) फोरम के राष्ट्रीय संयोजक अंबरीश राय ने कहा, “भारत सरकार और विश्व बैंक को एक आत्मनिर्भर, सशक्त, न्यायसंगत और नवाचारपूर्ण सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था के निर्माण का लक्ष्य रखना चाहिए। स्ट्रेंथेनिंग टीचिंग लर्निंग एंड स्टेट्स फॉर स्टेट्स (STARS) परियोजना अपने वर्तमान स्वरूप में इस मकसद को पूरा करने में विफल है। बल्कि यह स्कूली शिक्षा व्यवस्था के निजीकरण को ही बढ़ावा देगा।
मार्च 2020 में, मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने संसद को सूचित किया कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय भारत में प्राथमिक शिक्षा के निजीकरण की कोई योजना नहीं बना रही है (http://164.100.47.194/Loksabha/Questions/QResult15.aspx?qref=14792&lsno=17)। हालांकि, इस परियोजना में निजी संस्थानों के साथ साझेदारी (पीपीपी) संबंधी प्रस्ताव समेत विशेष रूप से सरकारी स्कूलों को हस्तांतरित करने, स्कूल वाउचर प्रदान करने, प्रबंधन फर्मों के जुड़ाव की योजना और मूल शैक्षिक कार्यों की आउटसोर्सिंग आदि का खूब जिक्र है। गौरतलब है कि शिक्षा की मौजूदा स्थिति का स्वतंत्र रूप से मूल्यांकन करने वाले असर” (एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट ASER) या विश्व बैंक की डब्ल्यूडीआर 2018 (WDR 2018 ) और बॉम 2018 Baum (2018) जैसी रपटें स्पष्ट रूप से बताती हैं कि निजी स्कूलों और सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) वाली व्यवस्था न केवल बेहतर गुणवत्ता वाली शिक्षा मुहैया कराने में विफल है बल्कि मौजूदा  हालत का फायदा उठाते हुए मुनाफा कमाना ही इनका ध्येय है।
सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च की वरिष्ठ सदस्य किरण भट्टी ने कहा: राज्य समर्थित निकायों के क्षमतावर्द्धन के लिए बुनियादी सुधार के बिना, सिर्फ़ प्रौद्योगिकी व तकनीक पर ज्यादा ज़ोर देने भर से और शिक्षा में सुधार के लिए निजी संस्थाओं के हाथों में जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा सौंप देने वाली नीति शैक्षिक सुधार  कार्यक्रम को लागू करने में सफल नहीं हो सकती। और ही संज्ञानात्मक क्षमताओं की आकलन –विधियों में सुधार ले आने से माप को सुधारने से सीखने में सुधार होता है। परियोजना का मुख्य जोर ही गलत दिशा में है।
असमानता घटाने के लिए अपेक्षित समता-मूलक उपायों की कोई चर्चा नहीं
हालांकि यह परियोजना कथित तौर पर भारत में गरीबी, भेदभाव और असमानता को दूर करते हुए शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के लिए लाई गई है, लेकिन पीढ़ी-दर–पीढ़ी चली आ रही सामाजिक आर्थिक बाधाओं या स्कूली दायरे से बाहर छूट गए (आउट ऑफ स्कूल) बच्चों की समस्या के समाधान के लिए समतामूलक उपायों के बारे में यह कोई चर्चा नहीं करती। दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों एवं भारतीय परिवेश के संदर्भ में पितृसत्तात्मकता एवं अन्य पिछड़े विचारों से  जूझ रही लड़कियों की शिक्षा की बेहतरी के लिए भी यह परियोजना कोई रास्ता नहीं सुझाती। ये भी तब जबकि स्कूली शिक्षा के दायरे से बाहर 75 फीसदी बच्चे दलित, आदिवासी और मुस्लिम हैं। (https://scroll.in/article/729051/how-the-right-to-education-is-failing-the-very-children-it-was-meant-to-benefit)

ऑक्सफैम इंडिया में शिक्षा और असमानता की लीड विशेषज्ञ के बतौर कार्यरत और लंबे अरसे से शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत एंजेला तनेजा, ने कहा, "भारत की शिक्षा व्यवस्था बड़े पैमाने पर विषमताओं से जूझ रहा है। परियोजना के लिए सफलता का पैमाना तो यही होना चाहिए कि वह गरीबों और हाशिये पर पड़े लोगों को अपने अधिकार हासिल करने की राह दिखा पाये। यह परियोजना जाति और लिंग आधारित भेदभाव को खत्म करने या व्यवस्था में सुधार के लिए जरूरी संतमूलक उपायों के संदर्भ में कोई सार्थक दृष्टि नहीं देता है। समता सूचकांकों के बरक्स सभी स्कूलों (सरकारी और निजी) का इक्विटी ऑडिट जैसे उपाय शायद पठन-पाठन में कुछ सकारात्मक साबित होते, लेकिन यह परियोजना इन जरूरी पहलुओं पर पूरी तरह खामोश है।“

गुणवत्ता में सुधार के लिए सुझाए गए रास्ते कतई कारगर नहीं
यह परियोजना मानकीकृत परीक्षण-आकलन पर कुछ ज्यादा ही जोर देती है और छात्रों के  मूल्यांकन के लिए विशेष रूप से पीसा (पीआईएसए यानी प्रोग्राम फॉर इंटरनेशनल स्टूडेंट असेसमेंट, https://www.oecd.org/pisa/) जैसे अंतर्राष्ट्रीय लर्निंग असेसमेंट प्रोग्राम की बात करती है। इसमें कोई शक नहीं कि भारत में पठन-पाठन की प्रक्रिया मेँ सुधार की पर्याप्त गुंजाइश है और इसके लिए ठोस उपाय किए जाने चाहिए लेकिन शिक्षकों की रोजमर्रा की दिक्कतों को हल किए बगैर या शिक्षा व्यवस्था में बुनियादी बदलाव के सार्थक तरीके अपनाए बिना शैक्षिक सुधार के कार्यक्रमों को थोप देने से बदलाव कैसे संभव है। एक अहम बात ये भी है कि इस परियोजना को बनाते वक़्त शिक्षकों और शिक्षा से जुड़े अन्य नेटवर्क या मंचों से भी कोई सलाह–मशवरा नहीं किया गया है।
राम पाल सिंह, अध्यक्ष, ऑल इंडिया प्राइमरी टीचर्स फेडरेशन ने कहा, “स्टार्स परियोजना का डिज़ाइन दर्शाता है कि शिक्षक समुदाय से परामर्श नहीं किया गया था। परियोजना का जोर शिक्षकों और सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली को सशक्त बनाने पर होना चाहिए था न कि सिर्फ़ शिक्षकों का परीक्षण करने पर। शिक्षा में सुधार के नाम पर करदाताओं से प्राप्त राशि को प्रबंधन फर्मों और निजी संस्थानों को लुटा देना आम जनता के हक में शिक्षा व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं लाएगा।

मित्ररंजन
मीडिया समन्वयक
राइट टू एजुकेशन फोरम
संपर्क : 9717965840
-           
संपादक से अनुरोध :
संपूर्ण पत्र की प्रति संलग्न है।
ऋण विश्लेषण पढ़ने के लिए, कृपया देखें: https://bit.ly/30HE9V5
और जानकारी के लिए कृपया एंजेला तनेजा (anjela@oxfamindia.org) से संपर्क करें।
नीचे उन व्यक्तियों और संगठनों के नाम दिए गए हैं जिन्होंने पत्र का समर्थन किया है:

हस्ताक्षरकर्ता:
1. शांता सिन्हा, पूर्व अध्यक्ष, एनसीपीसीआर
2. मनोज झा, सांसद, राज्यसभा- राष्ट्रीय जनता दल (बिहार)
3. जयति घोष, प्रोफेसर, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय
4. रितु दीवान पूर्व निदेशक, अर्थशास्त्र विभाग, मुंबई विश्वविद्यालय
5. आर गोविंदा- पूर्व वीसी, न्यूपा
6. नंदिनी सुंदर, प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय
7. ज़ोया हसन- प्रोफेसर एमेरिट, जेएनयू
8. बिदिशा पिल्लई, सीईओ, सेव द चिल्ड्रन इंडिया
9. किरण भट्टी- सीनियर फेलो, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च
10. आर वेंकट रेड्डी, राष्ट्रीय संयोजक, एमवी फाउंडेशन
11. मोहन राव, पूर्व प्रोफेसर, सेंटर ऑफ सोशल मेडिसिन एंड कम्युनिटी हेल्थ, जेएनयू
12. नंदिनी मांजरेकर, प्रोफेसर, टीआईएसएस, मुंबई
13. प्रवीण झा, प्रोफेसर, जेएनयू
14. सुकन्या बोस, सहायक प्रोफेसर, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी
15. प्रो॰ अनीता रामपाल, दिल्ली विश्वविद्यालय
16. देविका सिंह, राइट टू अर्ली चाइल्डहुड डेवलपमेंट
17. अरविंद सरदाना, पूर्व निदेशक, एकलव्य
18. डॉ मैक्सिन बर्नत्सेन, संस्थापक, प्रगति शिक्षण संस्थान
19. संगीता चटर्जी, पोस्टडॉक्टोरल फेलो, जॉन्स हॉपकिंस विश्वविद्यालय
20. शिवा शंकर, विजिटिंग प्रोफेसर, IIT बॉम्बे
21. पूजा पार्वती, कंट्री मैनेजर, इंटरनेशनल बजट पार्टनरशिप
22. राधिका गोरूर, एसोसिएट प्रोफेसर, डीकिन विश्वविद्यालय
23. डॉ एनी कोशी, प्रिंसिपल, सेंट मैरी स्कूल, दिल्ली
24. डॉ. मनीष जैन, एसोसिएट प्रोफेसर, अंबेडकर विश्वविद्यालय
25. सिमंतिनी धुरु, निदेशक, एवी अबेकस परियोजना
26. पद्मा वेलस्कर, पूर्व प्रोफेसर, टीआईएसएस, मुंबई
27. श्रीधरन नायर, निदेशक, परिवार नियोजन संघ
28. योगेश वैष्णव, संस्थापक, विकास संस्थान
29. डॉ नित्या नंदा, निदेशक, काउंसिल फॉर सोशल डेवलपमेंट (सीएसडी), नई दिल्ली
30. सोमा केपी, नेशनल फैसिलिटेटर, मेकैम
31. मानबी मजूमदार, सामाजिक विज्ञान केंद्र, कलकत्ता में अध्ययन केंद्र
32. नलिनी जुनेजा, पूर्व प्रोफेसर, राष्ट्रीय शैक्षिक योजना और प्रशासन संस्थान, नई दिल्ली
संगठनात्मक समर्थन
1. वादा ना तोड़ों अभियान (राष्ट्रीय)
2. राइट टू एजुकेशन (आरटीई) फोरम
3. नेशनल कोएलिशन ऑफ एजुकेशन (NCE) इंडिया, राष्ट्रीय  
4. अखिल भारतीय प्राथमिक शिक्षक महासंघ (AIPTF), राष्ट्रीय
5. अखिल भारतीय माध्यमिक शिक्षक महासंघ (AISTF), राष्ट्रीय
6. ऑल इंडिया फेडरेशन ऑफ टीचर्स ऑर्गनाइजेशन (AIFTO), नेशनल
7. एआईएफटीओ, राजस्थान
8. एआईएफटीओ, मध्य प्रदेश
9. एआईएफटीओ, हिमाचल प्रदेश
10. बृहन्मुंबई महापालिका शिक्षा सभा, महाराष्ट्र
11. केरल प्रदेश स्कूल शिक्षक संघ, केरल
12. ऑक्सफैम इंडिया, नेशनल
13. चाइल्ड एलायंस फॉर चाइल्ड राइट्स (IACR), नेशनल
14. भारतीय सामाजिक कार्य मंच, राष्ट्रीय
15. दलित मानवाधिकार पर राष्ट्रीय अभियान
16. राष्ट्रीय युवा समानता मंच, राष्ट्रीय
17. अनुसूचित जाति और पिछड़ा वर्ग कर्मचारी महासंघ, राष्ट्रीय
18. विकलांग लोगों के लिए रोजगार को बढ़ावा देने हेतु राष्ट्रीय केंद्र
19. मोबाइल क्रेचेज, नेशनल
20. अखिल महाराष्ट्र प्रथमिक शिक्षा संघ, महाराष्ट्र
21. हिमाचल सरकार शिक्षक संघ, हिमाचल प्रदेश
22. हिमाचल प्रदेश प्राथमिक शिक्षक महासंघ, हिमाचल प्रदेश
23. मध्य प्रदेश सरकार प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षक संघ, मध्य प्रदेश
24. मध्य प्रदेश शस्यक्या प्रथमिक मधयमिक शिक्षा संघ, मध्य प्रदेश
25. स्वतंत्र शिक्षक संघ, मध्य प्रदेश
26. ऑल उत्कल प्राथमिक शिक्षक महासंघ, ओडिशा
27. झारखंड राज्य प्राथमिक शिक्षक समूह, झारखंड
28. सामाजिक अभियान के लिए जन अभियान - आर्थिक समानता, हिमाचल प्रदेश
29. ओडिशा आरटीई फोरम, ओडिशा
30. महाराष्ट्र आरटीई फोरम, महाराष्ट्र
31. हिमाचल प्रदेश आरटीई फोरम, हिमाचल प्रदेश
32. मध्य प्रदेश लोक सुभगा साझा मंच, मध्य प्रदेश
33. स्कोर (स्टेट कलेक्टिव फॉर राइट टू एजुकेशन), उत्तर प्रदेश  
34. पश्चिम बंगाल RTE फोरम, पश्चिम बंगाल
35. चाइल्ड अलर्ट एलायंस, तमिलनाडु
36. ह्यूमन राइट्स अलर्ट, मणिपुर
37. पीपुल्स वॉच, तमिलनाडु
38. शिक्षा का अधिकार फोरम, तमिलनाडु
39. बाल अधिकार सामूहिक, गुजरात
40. एजुकेशन पॉलिसी इंस्टीट्यूट ऑफ बिहार, बिहार
41. भारत ज्ञान विज्ञान समिति (बीजीवीएस), राष्ट्रीय

STARS Project in Six Indian States

वर्ल्ड बैंक मानव संसाधन मंत्रालय को 500 मिलियन डॉलर का कर्ज एसटी एआरएस परियोजना के तहत 6 राज्यों केरल, राजस्थान, ओडिशा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र एव्ं हिमाचल प्रदेश के लिये देने जा रहा है। दिलचस्प ये है कि इस प्रोजेक्ट में वर्ल्ड बैंक का योगदान मात्र 15% का  होगा जबकि केंद्र व राज्य सरकारों के द्वारा शेष 85% राशि वहन की जायेगी। परियोजना में निजी संस्थानों की भागीदारी को तरजीह दी गई है जिसका सीधा मतलब है सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था को और बदहाल कर निजी मुनाफे के लिए प्रारंभिक शिक्षा के दरवाजे खोलना। परियोजना में सरकारी ढाँचा की संरचनात्मक क्षमता को बढ़ाने पर भी कोई पुख़्ता जोर नहीं है। देश भर के 24 राज्यों से 1400 लोगों और संगठनों  ने शिक्षा के क्षेत्र में निजीकरण बढ़ने के खतरे को देखते हुए  इस परियोजना के स्थगन के लिए वर्ल्ड बैंक को खत लिखा है।

There are many concerns and issues which should be addressed immediately.

The most important among them is the change of the whole scenario. At the time of the development of the the Project STARS, COVID-19 pandemic was not considered. It was not there. The COVID-19 pandemic came to India only after January 2020 and the Project was visualized and planned much earlier. The COVID-19 fundamentally changed the whole scenario in the education sector. It has created new challenges, which was not visualised before Jan 2020.  There is digital divide in India. The backward area, the more digital problem.

85 % of the rural India does not have access to internet. Now how will they go for online education? There are many villages in the far flung areas which do not get electricity regularly. these people will not be able to recharge their mobiles. 
No-1, only 15 % of villagers have internet.
No-2, many of them do not get regular electricity to recharge their mobile.
No-3, The smart phones are with elders or parents. When they go out for work, they carry the phone with them. So very less % of children get access to smart phone to attend online classes.




Saturday, June 20, 2020

व्यापक सामाजिक विभाजन की तरफ धकेलने का बाजारवादी कुचक्र बनेगी डिजिटल शिक्षा



व्यापक सामाजिक विभाजन की तरफ धकेलने का बाजारवादी कुचक्र बनेगी डिजिटल शिक्षा

“डिजिटल शिक्षा से 80 फीसद बच्चों के पढ़ाई से वंचित होने का खतरा”



राइट टू एजुकेशन फोरम द्वारा आयोजित वेबिनार में वक्ताओं ने शिक्षा में वर्चस्ववाद की आशंका जतायी



आरटीई फोरम, नई दिल्ली 20 जून 2020। कोरोना महामारी की पृष्ठभूमि में इस समय डिजिटल शिक्षा को आगे बढ़ाया जा रहा है। लेकिन यह गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लक्ष्य को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। विभिन्न कम्पनियों द्वारा मुनाफे की दृष्टि से डिजिटल शिक्षा की जोर–शोर से पैरोकारी की जा रही है। शिक्षा पहले से ही ख़तरे में थी, अब तो समस्या और भी विकराल हो गई है। डिजिटल पढ़ाई नियमित विद्यालय का विकल्प नहीं बन सकती। विद्यालय हमें सामाजिकता का बोध कराता है तथा गैर–बराबरी और  उंच-नीच की भावना को कम करता है। शिक्षा दरअसल मानव जीवन की शुरुआत से समाजीकरण के जरिये व्यक्तित्व-निर्माण की व्यापक प्रक्रिया है। उसे सिर्फ “लर्निंग आउटकम” से जोड़कर देखना व्यक्ति और समाज के विकास में शिक्षा की भूमिका को कमतर कर के आंकना है। अफसोस कि शिक्षा को समग्रता में देखने की बजाय उसे खंडित तरीकों से देखने और उन्हीं निष्कर्षों के आधार पर नीतियाँ तैयार करने का चलन बन गया है। लेकिन, एक लोकतान्त्रिक, समतामूलक, समावेशी और वैज्ञानिक समाज की स्थापना के लिए न केवल शिक्षा के मुख्तलिफ़ आयामों पर विमर्श जरूरी है बल्कि समाज के हाशिये पर मौजूद दलित-वंचित-आदिवासी और कमजोर वर्गों तक तक शिक्षा के न पहुँच पाने से जुड़ी चुनौतियों की शिनाख्त हकीकत की धरातल पर उतरकर करनी जरूरी है। ये बातें वक्ताओं ने  राईट टू एजुकेशन (आरटीई) फोरम द्वारा शिक्षा-विमर्श की सातवीं कड़ी में “डिजिटल लर्निंग के जरिये गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा - जमीनी हकीकत” विषय पर आयोजित वेबिनार में कही।



इस वेबिनार का संचालन अद्यतन शिक्षाशास्त्रीय विमर्शों के साथ निरंतर जुड़े, शैक्षिक अध्ययन विभाग, अम्बेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली में कार्यरत डॉ॰ मनीष जैन ने किया।



अपने संबोधन में दिल्ली विश्वविद्यालय, शिक्षा विभाग के सेंट्रल इंस्टिट्यूट ऑफ़ एजुकेशन की प्रो॰ पूनम बत्रा ने  कहा कि डिजिटल शिक्षा को ही अब शिक्षा देने का विकल्प मान लिया गया है, जो गलत है। समाज के भीतर व्यापक आबादी की न्यूनतम डिजिटल पहुँच के ठोस आंकड़ों और जातिगत, संसाधनों की उपलब्धता, लैंगिक भेद-भाव जैसे सामाजिक-आर्थिक विभेद के कारकों की सघन मौजूदगी के बावजूद डिजिटल शिक्षा के पक्ष में उठाया जा रहा शोर हर बच्चे को शिक्षा मुहैया कराने और शिक्षा के लोकव्यापीकरण के घोषित लक्ष्यों के प्रति संदेह उत्पन्न करता है। ऐसा लगता है जैसे पहले से ही नवउदारवादी नीतियों की शिकार शिक्षा के ऊपर वर्चस्ववादी नजरिये का घेरा और तंग होता जा रहा है। शिक्षा को समानता, आर्थिक तथा सामाजिक न्याय की दृष्टि से देखने की जरूरत है।



उन्होंने कहा, “डिजिटल पढ़ाई, शिक्षा के उद्देश्यों को संपूर्ण रूप से पूरा नहीं करती है। शिक्षा-विमर्श की विभिन्न धाराओं पर चर्चा करते हुए महात्मा ज्योतिबा फुले सरीखे सामाजिक बदलाव के अगुआ जननायकों को यहाँ याद करना जरूरी होगा जिन्होंने औपनिवेशिक शिक्षा के प्रारूप के खिलाफ जारी एक राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली की सीमाओं से आगे जाकर बराबरी के समाज का निर्माण और उसमें शिक्षा की अविछिन्न भूमिका को रेखांकित करते हुए अपनी लड़ाई लड़ी। उन्होंने शिक्षा को समग्रता में देखा था और उसी के हिसाब से आगे बढ़ाने का प्रयास किया था। पहले शिक्षा पर एक किस्म का वर्चस्ववाद हावी था। समाज के एक वर्ग द्वारा अपने को श्रेष्ठ मान कर और अपनी श्रेष्ठता क़ायम करने की दृष्टि से शिक्षा का स्वरूप तैयार किया गया था। लगातार संघर्ष के जरिये हमने शिक्षा के संदर्भ में कई अहम अधिकार और मुकाम हासिल किए। लेकिन धीरे-धीरे शिक्षा बाजार में पहुंच गया और फिर शिक्षा का ही बाज़ारीकरण हो गया। जैसे ही शिक्षा बाजार में पहुँचा, शिक्षा का संदर्भ भी बदल गया।”



प्रो. बत्रा ने आगे जोड़ा, “कोरोना के रूप में आई वैश्विक आपदा की वजह से शिक्षा पर हावी होने की सतत कोशिश में लगे बाजार को अभी डिजिटल शिक्षा को बढ़ाने का अवसर मिल गया है। इसे मुनाफे की दृष्टि से देखा जा रहा है। अनेक कम्पनियों की ओर से डिजिटल शिक्षा को आगे बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। यह निश्चित रूप से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लक्ष्य को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। शिक्षा पहले से ही ख़तरे में थी, अब तो समस्या और भी विकट हो गई है। शिक्षा को पहले भी महज सीखने या लर्निंग से जोड़कर उसके मकसद को सीमित करने का प्रयास किया गया और अब इसे उपभोक्तावाद पर पहुंचा दिया गया है। समाज में पहले से ही अनेक प्रकार के भेदभाव थे, डिजिटल शिक्षा उसे औऱ बढ़ा देगी। सबसे खतरनाक बात तो यह है कि समाज में बहुतायत लोग अपने अधिकारों को खो देंगे। लिहाज़ा हमें डिजिटल शिक्षा के विकल्प की बात करनी होगी। हमें शिक्षा के ऐसे समावेशी स्वरूप की बात करनी होगी जो समतामूलक समाज के निर्माण की धुरी बन सके।”



वेबिनार में अपनी बात रखते हुए, दिल्ली विश्वविद्यालय के लेडी श्रीराम कॉलेज में प्रारम्भिक शिक्षा विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर स्मृति शर्मा ने कहा कि वर्तमान समय में डिजिटल शिक्षा को समालोचनात्मक दृष्टि से देखने की जरूरत है। राज्य की शिक्षा में दखलंदाजी पहले से रही है। लेकिन राज्य की भूमिका किनके पक्ष में है, ये देखना दिलचस्प है। शिक्षा पूरी तरह से राजनीतिक मसला रहा है। शिक्षा कुछ लोगों के द्वारा समाज पर थोपा जाता रहा है।



अपने एक शोध पत्र का जिक्र करते हुए प्रो. शर्मा ने कहा, “ डिजिटल शिक्षा किसकी जरूरतों को पूरा करेगी, हम सभी लोग अच्छी तरह से जानते और समझते हैं। वंचित समाज इसमें कहीं भी अपने को नहीं पा सकता। शिक्षा सामाजिक बदलाव का महत्वपूर्ण कारक होता है। शिक्षा का मतलब होता है कि सीखने और सिखाने की प्रक्रिया साथ में हो। बगैर साझा संवाद और शिक्षक-छात्र की जीवंत भागीदारी प्रक्रिया को अमल में लाये हम बच्चों को कैसी शिक्षा देंगे और कैसा समाज बनाएँगे? डिजिटल शिक्षा पर अत्यधिक ज़ोर पहले से ही हाशिये पर खड़े लोगों शिक्षा के दायरे से और बाहर कर देगा। वर्तमान समय में डिजिटल शिक्षा का विकल्प अगर हम नहीं ढूढ़ पा रहे हैं, तो इसमें भी हमारी शिक्षा व्यवस्था का दोष है। शिक्षकों, नागरिक समुदाय के लोगों और बुद्धिजीवियों को एक साथ मिलकर सोचना होगा तभी विकल्प की तलाश पूरी हो पायेगी।”



इससे पहले, वेबिनार में शामिल सभी लोगों का स्वागत करते हुए राईट टू एजुकेशन फोरम के राष्ट्रीय संयोजक अम्बरीष राय ने कहा कि डिजिटल शिक्षा से 80 फीसदी बच्चों के पढ़ाई से अलग होने का खतरा है क्योंकि सभी के पास डिजिटल डिवाइस नहीं हैं ।



श्री राय ने कहा, “डिजिटल पढ़ाई विद्यालय का विकल्प नहीं बन सकता। विद्यालय हमें सामाजिकता का बोध कराता है तथा गैर–बराबरी और  उंच-नीच की भावना को कम करता है।”



वेबिनार का संचालन कर रहे डॉ॰ मनीष जैन ने वक्ताओं की बातों का सार प्रस्तुत करते हुए शिक्षा, व्यक्ति व समाज के अंतर्संबंधों को रेखांकित करते हुए कुछ महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ कीं।

उन्होंने कहा, “देश भर से कई स्रोतों से आ रही रपटें बताती हैं कि ऑनलाइन लर्निंग के पाठ्यक्रम और सत्र बच्चों और अभिभावकों दोनों के लिए कितने कष्टप्रद साबित हो रहे हैं। दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में भी मुश्किल से 50 फीसदी बच्चे ही डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़ पा रहे हैं। डिजिटल शिक्षा की बढ़ती पैरोकारी पर दो टूक टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं कि शिक्षा एक राजनीतिक मसला है और हमें देखना होगा कि यह राजनीति जनसरोकारों से जुड़ी है या नहीं। शिक्षा के लिए राज्य की जवाबदेही को लोकतान्त्रिक मायनों में देखने की जरूरत है। शिक्षा के विभिन्न हितधारकों (स्टेकहोल्डर्स) की लोकतान्त्रिक भागीदारी के बगैर  सिर्फ तकनीक और प्रबंधन के जरिये कुछ लोगों को सूचनात्मक जानकारियाँ उपलब्ध करा देना शिक्षा नहीं है। शिक्षा के बुनियादी ढांचे में अपेक्षित निवेश और हाशिये के हिस्सों के लिए सामाजिक पायदानों पर ऊपर चढ़ने की सीढ़ियों को सहज-स्वाभाविक बनाए बगैर हम सर्वांगीण सामाजिक विकास और शिक्षा के मूल उद्देश्यों की तरफ एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा सकते। शिक्षा, हाशिये पर मौजूद लोगों के सशक्तीकरण, एक बेहतर गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार को हासिल करने का एक सशक्त औज़ार है। क्या डिजिटल लर्निंग शिक्षा के इन बुनियादी उद्देश्यों को पूरा कर सकेगा? अगर नहीं, तो हम ऐसी किसी भी तात्कालिक गतिविधि को नियमित शिक्षा का विकल्प बनाने के बारे में सोच भी कैसे सकते हैं?”

डॉ॰ मनीष जैन ने प्रतिभागियों की तरफ से आए कुछ अहम सवालों को भी को भी चर्चा-सत्र के दौरान रखा। वेबिनार में देश भर से तकरीबन 325 प्रतिभागियों ने शिरकत की।

मित्ररंजन
मीडिया समन्वयक
आरटीई फोरम
मो॰- 9717965840

Friday, June 19, 2020

No Less than April 2020 status of the LAC in Galwan Valley in Ladakh

I don't know why the government was hiding about the status of 10 soldiers. The return of 10 soldiers from the Chinese custody is good news. I salute to our brave soldiers.

20 soldiers martyred in Ladakh and 10 were captured and about 76 of them are injured.
Right now the environment is very  violent against China in India.

The important questions are
1. Was the Government of India sleeping, when Chinese entered in our region?
2. Was the soldiers without arms? if so, why?
3. In spite of so many warning from the ex-army men, the government could not act in time. Why?
4. When the soldiers were fighting on the boarders, why Home Minister and the Defense Minister busy in Virtual rallies?














Wednesday, June 17, 2020

Education & Child Rights in Bihar During COVID-19 Pandemic

धन्यवाद-ज्ञापन


आज आरटीई फोरम, बिहार की ओर से बिहार में शिक्षा और बाल अधिकारों का परिदृश्य : लॉक डाउन का विशेष
संदर्भ विषय पर आयोजित वेबिनार में दिल्ली, उत्तरप्रदेश और बिहार के लगभग 45 साथियों ने भाग लिया।


पूरी बातचीत लॉक डाउन की अवधि में उत्पन्न परिस्थितियों, प्रवासी छात्रों, वंचित समुदाय के बच्चों, बालिकाओं की
स्थिति, ऑनलाइन शिक्षण की परेशानियाँ और दुष्प्रभाव पर केंद्रित रही। इस वर्तमान परिस्थिति के साथ ही शिक्षा
अधिकार की मजबूती के लिए किये जाने वाले प्रयासों की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए उसे कार्यरूप देने का संकल्प
भी व्यक्त हुआ।


कई तकनीकी कारणों से बहुत सारे साथी इस वार्ता में नहीं जुड़ पाए और कई जुड़कर भी अपनी बात नहीं रख पाए।
उसके लिए हमें खेद है। शीघ्र ही हम सारे साथियों को पूरी वार्ता की रिपोर्ट उपलब्ध कराएंगे।


इस सार्थक एवं महत्वपूर्ण वार्ता को संपन्न कराने में सहयोग प्रदान करने के लिए हम आरटीई फोरम के केंद्रीय
कार्यालय के प्रति आभारी हैं, विशेष रूप से राष्ट्रीय संयोजक श्री अंबरीश राय, बिहार प्रभारी , श्री मित्ररंजन एवं सृजिता
का,जिनके विशेष अभिरुचि के बिना यह वार्ता संभव नहीं हो सकती थी। हम आभारी हैं ऑक्सफेम इंडिया,
केयर इंडिया, सेव द चिल्ड्रन, मलाला फंड, एक्शन ऐड, कैरिटास, वर्ल्ड विज़न, चाइल्ड फंड आदि विभिन्न संस्थाओं के
प्रतिनिधियों का, जिन्होंने इस वार्ता को समृद्ध बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। हम विशेष रूप से आभार व्यक्त करते हैं
अपने जिला संयोजकों का, जो नेटवर्क और तकनीक की तमाम दिक्कतों के बावजूद इस वार्ता में जुड़े और बहुत ठोस
तरीके से अपनी बात रखी। जो साथी प्रयास के बावजूद नहीं जुड़ पाए, हम उनके प्रयास के प्रति भी आभारी हैं।
हम आभारी हैं बिहार बाल आवाज मंच, बचपन बचाओ आंदोलन, अखिल भारतीय कबाड़ी मजदूर महासंगठन,
विकलांग अधिकार मंच, दलित अधिकार मंच, भोजन का अधिकार, शिक्षक संगठन, छात्र संगठन और सांस्कृतिक
संगठन के साथियों का भी, जिन्होंने इस वार्ता में जुड़कर बच्चों की शिक्षा के मार्ग के अवरोधों के विविश पक्षों की
चर्चा की और आगे की राह बताई। 


बच्चों की शिक्षा की चिंता करने वाले तमाम साथियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए हम उम्मीद करते हैं कि आगे
भी हम एकसाथ चलेंगे।


संवदध्वमि संगच्छध्वमि संवो मनांसि जानतम।


सधन्यवाद
अनिल कुमार राय
संयोजक,
आरटीई फोरम बिहार
RTE Forum Bihar

Tuesday, June 16, 2020

Sad News Coming from Laddakh

It's shattering.  About 20 Indian army personnel martyred during the 

World Bank Project STARS in 6 States of India.


This is the COVID-19 Crises time and we must focus on addressing the issues related to COVID-19.  First we came to know about New Education Policy 2020 and now we came to know about the Project STARS.


The World Bank Project STARS (Strengthening Teacher-learning and Results for States)- to fund various educational programmes in  six states including Himachal Pradesh. The important point to note is that the World Bank  will be only supporting 15 % of the total budget but they will be holding and guiding the whole Project STARTS. We must understand and take a stand.   


Total cost of this project is 3.346 Billion US Dollar with 15% contribution (loan) of World Bank, it means 80/ of total project money will be contributed by Union Govt and States, this is the way for world bank to legitimise entry into policy making while contributing very little in terms of loan amount of INR 5000 crores is tiny compared to financing needs. The project will cover 6 states Kerala, Himachal Pradesh, Rajasthan, Maharashtra, Odisha and Madhya Pradesh. A national framework is being proposed to engage private sector and promote PPPs. There is excessive focus on assessments and use of technology, instead addressing the severe challenges facing by concerned states in education.


The project STARS or “Strengthening Teaching-Learning and Results for States” is a quarter trillion
rupees education project in six states in India, part-funded by a loan from the World Bank. A portion of the funds are proposed to be spent in partnership with non-state actors including handing over
operation and management of government schools to non-state actors, outsourcing services, seeking
support of management firms/NGOs and direct benefit transfers as school vouchers. The overarching
framing of the loan needs to be revised in context of the COVID-19 pandemic, pilot partnerships with
the private sector should be removed and replaced with measures to strengthen the public sector, and
a stronger focus on equity built in.


Its components include: strengthening early years education; improving learning assessment
systems, particularly India’s participation in PISA 20212, competency-based assessments, and
Continuous and Comprehensive Evaluation(CCE); strengthening classroom instruction and
remediation; improving teacher development and school leadership; facilitating school to work/
higher education transition; and, strengthening the district as the unit of planning. As such, it seeks
to further the stated objectives of the Samagra Shiksha Abhiyan and is in line with the existing
government objectives. There are many components in the same which support actions that are
beneficial to India.

The STARS project risks significant diversion of Indian taxpayers’ funds to an array of private
actors, introduces the privatisation of education in six of India’s states, and changes the framing for
the private sector’s engagement with education in India as a whole. Accordingly, understanding the
provisions of the loan is not just of academic interest, but would be critical for engaging with the
loan process and the project as a whole, which is likely to have far-reaching impacts on the Indian
education system. We acknowledge the improvement made in the framing of the loan through
removing mention of a 20% earmark for partnerships in the Bank’s Programme Information
Documents (PID). However, we feel that this change does not address the substantial concerns
on the content that remain.

The specific concerns with the project and the loan which need to discuss and addressed before it is passed/ approved.